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आकाश वापस लौट जाता है - जनमेजय की कविताएँ
क्षितिज पर एक खिड़की
बंद होने लगती है
वृक्ष की फुनगियों पर टिका
आकाश वापस लौट जाता है
लेकिन कोई दावा नहीं करता।


प्रभात की कविताओं से सजा संसार
प्रभात की कविताओं का आम आदमी इस देश का मध्यमवर्गीय और ग़रीब आदमी है। उसे भरे बाज़ार में घिसी चप्पलों का तकिया लगाकर नींद आ जाती है।


किसी भी नंबर से आ सकता है मुझे तुम्हारा फोन — केतन यादव की कविताएँ
तभी मेरे भ्रम ने मुझसे कहा
अब दुनिया के सभी नंबर तुम्हारे ही हैं
किसी भी नंबर से आ सकता है मुझे तुम्हारा फोन।


वन्ध्या प्रार्थनाओं और लौटती स्मृतियों के बीच – दीप्ति कुशवाह की कविताएँ
मैं लौटती हूँ
न घर, न देहरी, न दीवार
बस एक पुरानी बाँस की खटिया
जहाँ समय ने रस्सियों को झुकाकर
लौटने और न लौट पाने का अंतर लिखा है।
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