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प्रभात की कविताओं से सजा संसार

  • 7 days ago
  • 1 min read
प्रभात की कविताओं से सजा संसार


कवि प्रभात का तीसरा कविता संग्रह ‘अबके मरेंगे तो बदली बनेंगे’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है। प्रभात लोक जीवन, प्रेम और स्मृति के कवि हैं। कवि बरसाती नालों को गंगा की संज्ञा देता है। वह ग्राम्य जीवन‌ को यूँ याद करता है-


“तिपाए पर पानी का घड़ा रखा होता था

अनाज के देर के पास

तूड़े के ढेर के पास मेरी खाट

और ऊपर तारों जड़ी रात”


प्रभात वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा को सही मायने में पहचानते हैं। वह जीव-जंतुओं, जंगलों, नदियों, पहाड़ों और पेड़ों को इस दुनिया का नागरिक मानते हैं।‌ ‘त्योहार’ कविता में वह हिंदू-मुसलमान के मिलजुल कर रहने की बात करते हैं। एक साझी संस्कृति का ख़्वाब जो अस्ल में भारत की नींव है। ‘रफ़ूगर’ कविता इसी नींव की बानगी है।


प्रभात की कविताओं का आम आदमी इस देश का मध्यमवर्गीय और ग़रीब आदमी है। उसे भरे बाज़ार में घिसी चप्पलों का तकिया लगाकर नींद आ जाती है। वह उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहता। वह आत्महत्या के विरुद्ध है और निराशा से उबरने के तरीके खोज रहा है। वह तानाशाही का शिकार है— व्यवस्था से दुखी है लेकिन व्यवस्था के नुमाइंदों के भीतर भी मनुष्य की पहचान करना जानता है-


“देखो एक बुढ़िया सिपाही को टमाटर दे रही है

और थाने को गाली

देखो एक बूढ़ा उसे मारने आए सैनिक से

खाना खाने के लिए कह रहा है”


इन कविताओं में राजस्थान प्रदेश की स्त्रियों का संघर्ष और दुख उभरकर सामने आता है। ‘नीलम’, ‘आधी आबादी’ और ‘जीने की जगह’ स्त्री विमर्श की सशक्त कविताएँ हैं। लहँगा-लूगड़ी के माध्यम से प्रभात माड़ क्षेत्र की संस्कृति का चित्र खींच देते हैं। इन कविताओं को पढ़कर ही तो पाठक जानता है कि माड़ की स्त्रियां लहँगे के एक सिरे को पैरों में दबाकर दूसरे सिरे को हाथों से मरोड़ते हुए निचोड़ती हैं। वे ससुराल से मायके आती है तो लूगड़ी को सिर से उतारकर कंधे पर डाल लेती हैं। युवतियाँ भैंसों को ललकारने के बहाने अपने प्रेमी तक संदेश पहुँचाती हैं।


‘धरोहर’ एक लंबी कविता है जो एक सामान्य कृषक के जीवन और मृत्योपरांत संसार की बात करती है। इस कविता में श्मशान वैराग्य की सघन अनुभूति है। प्रभात की कविताओं में श्मशान भी जीवन का उत्सव मनाता है— वहाँ बारिश होती है, ओले गिरते हैं, वे हवा से उड़ते हैं, फिर धूप निकलती है। चिता पर रखे जा रहे मृतक के लिए प्रभात रंग-बिरंगे वस्त्रो का ज़िक्र करते हैं, न कि फीके वस्त्रों का। रंगों का यह प्रयोग प्रभात की कविता को सकारात्मक और आशावादी बनाता है।


‘टहनी और फूल’ ‘अनोखा दुख’ ‘तुम’ और ‘जी लेंगे’ जैसी बेजोड़ प्रेम कविताएँ इस संग्रह की उपलब्धि हैं। इन कविताओं में प्रेम के साथ लोक इस क़दर गुंथा हुआ है कि मन सहज ही रीझ जाता है-


“अलभोर में गायों का गोबर उठाती तुम कितनी प्यारी लगती थी

भोर में आँगन लीपती तुम कितनी प्यारी लगती थी

लीपे हुए आँगन में माँडने माँडती तुम कितनी प्यारी लगती थी

थक हार कर सो जाती तुम कितनी प्यारी लगती थी

जागते ही मुझे ढूँढती हुई तुम कितनी प्यारी लगती थी”


इस कविता संग्रह में हमें एक ऐसा व्यक्ति नज़र आता है जो आधुनिकता और सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा हमारे जीवन में की जा रही ताक-झाँक से परेशान है। आधुनिक तकनीकी पर कविता लिखते हुए प्रभात अपने कंफर्ट जोन से बाहर जाते हुए लगते हैं और ये कविताएँ संग्रह की सबसे अच्छी कविताओं में से नहीं हैं। हालांकि कवि की कोशिश इन कविताओं में भी यही रहती है कि अपनी परिचित ज़मीन पर खड़े रहकर अपनी बात कही जाए। ‘टिप्पर’ शीर्षक कविता में यह कोशिश सार्थक हुई है। यह कविता मोबाइल गेम के नाम पर हो रही सट्टेबाजी और बेरोज़गारी पर कटाक्ष करती है।


संग्रह के अंत की कविताओं में कवि कुछ अधिक व्यापक विषयों पर चर्चा करता है। ‘फ़िलिस्तीन’ कविता युद्ध की त्रासदी को बयां करती है। एक माँ अपने मृत बच्चे को आंचल में समेटे उसकी लाश से संवाद कर रही है। इसी तरह ‘सत्ताएं’ कविता में दुनिया के हर कोने में मौजूद सत्ता के दोगलेपन पर कवि बात करता है। यह सत्ता सरकार हो सकती है और पितृसत्ता भी। इस कविता का विजन बहुत विस्तृत है-


“दूर से तो देश के झंडे ही दिखाई देते हैं

उनकी जेलें नहीं

यातनागृह नहीं

काले क़ानून नहीं”


किताबों की क़ीमत बढ़ रही है। कुछ प्रकाशक दो रुपए प्रति पेज से भी ज़्यादा ले रहे हैं, वह भी पेपरबैक किताब के लिए। पृष्ठ संख्या के हिसाब से यह किताब ठीक क़ीमत पर उपलब्ध है। मेरी नज़र में साल 2025 के सबसे अच्छे दो कविता संग्रहों में से यह एक है‌‌।


प्रभात की कामना है कि हिंदी कविता लोकगीतों जितनी आसान हो जाए। यही क्या कम है कि हम ऐसे कवि के समय में सांस ले रहे हैं?


~ देवेश पथ सारिया


पुस्तक‌ : अबके मरेंगे तो बदली बनेंगे

लेखक : प्रभात

प्रकाशक : निबंध प्रकाशन

पृष्ठ : 246

मूल्य : ₹400

2 Comments


आशुतोष प्रसिद्ध
6 days ago

प्रभात की कविताओं पर कविताओं सी बात। सुंदर लिखा है🌷❤️

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Guest
7 days ago

सार्थक और सटीक तथा संतुलित समीक्षा।

प्रभात जी और आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं भैया।

कृपया हरेक कवि लेखक का व्हाट्स ऐप नंबर दिया करें।

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