किसी भी नंबर से आ सकता है मुझे तुम्हारा फोन — केतन यादव की कविताएँ
- poemsindia
- Sep 8, 2025
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कालहीन
इतनी सुबह नहीं उठना चाहता कि कोई सुप्रभात जगाए मुझे
इतनी देर नहीं सोना चाहता कि शुभरात्रि ही सुला सके कोई
अब चौबीस घंटे को समय नहीं दूँगा ज़रा भी
महीने, छमाही और साल को एक दिन में बदल देना चाहता
और इस तरह मैं तुमसे अपना सारा वक़्त चुरा लूँगा
तुम्हारी घड़ी में मेरा कोई समय नहीं बजेगा
तुम्हारी कॉल हिस्ट्री नहीं गिनेगी कोई घंटे
तुम्हारे लिए अधिक खाली छोड़ जाऊँगा इक्कीसवीं सदी
तभी मेरे भ्रम ने मुझसे कहा
अब दुनिया के सभी नंबर तुम्हारे ही हैं
किसी भी नंबर से आ सकता है मुझे तुम्हारा फोन।
हिन्दी में रक़ीब
उसका चेहरा फिर आज कोई और-सा है
निगाह फिर तलाशी पर निकल रहे
उसके जिस्म के ज़ुबान से कोई निशान चीख रहा
पर उसने हिन्दी में प्यार किया था
तो फिर कौन है दूसरा इस ज़ुबान में ?
हिन्दी में दुख कहते अतृप्ति कहते संत्रास कहते
हिन्दी में कह सकते हैं अधिक से अधिक उजड़ा मन
और थोड़ा अधिक —
‘अंततः यह तुम्हारा निर्णय था !’
वे अपने भीतर दो लोगों का दुख जलाए रखते
बचाए रखते आँधियों में मरणासन्न लौ
अपनी उदासियों की आरी से
एक-एक करके समय को काटते रहते
और समय हो जाता और भी अछोर ।
कितनी पीड़ाएँ
न संगीत से सधीं न कविता में घटीं
और न ही अन्य कलाओं में बँट पाईं
सिंधु घाटी का दुःख
अबतक की सभ्यताओं ने पढ़ना कहाँ सीखा
और दिशाओं में बिखरा रहा
एक अबूझ अकेलेपन का बिंब
प्रेम की अतृप्तता में किया गया सबसे अधिक प्रेम
कुछ प्रेमी कुछ रिश्तों में किराएदार बनकर रहे
उनके एकांत को छुआ जा सकता है
बिना किसी चटक की आह सुने
बहुत कुछ कहा जा सकता है उन्हें
सपनों में किसी भी वक़्त चलने को
तैयार हो जाते हैं उनके पाँव
कहीं भी लग जाता है उनका मन आजकल
वे अपनी देह में हैं
या कोई दूसरा उनकी देह में
या किसी दूसरी देह के लिए
वे तीसरी देह में तब्दील
कर देना चाहते हैं खुदको
गंधराज और सोनजूही में अपनी रातें बाँध दीं
और दिन को टांग दिया खूँटी पर
रात की किसी सुगंधित पसीने की गंध की स्मृति के साथ
उनके कंधे पर कोई भी तितली आकर बैठ जाती
राह चलते कोई भी छोटी बच्ची उनका हाथ थाम लेती
बिल्लियाँ बाइक की गद्दी बेख़ौफ़ नाखूनों से नोच सकतीं
उनकी शर्ट पर वेटर कॉफी आज फिर उलेड़ सकता
उनके पहुँचते ही बियर शॉप बंद हो सकती है
और उनसे कितना भी उधार माँगकर भूला जा सकता है
ओह डियर जिंदगी!
उनके अकाउंट में अभी भी पर्याप्त पैसे बचे हैं,
वे इस दुनियाँ में जन्में हैं ख़ूब प्यार करने के लिए ।
अक्टूबर
शरद के आनंद में डूबे हुए पर्व की चौखट पर बैठे
एक उदास बच्चे को ताकता आसमान का क्षुद्रग्रह
पटाखों के चीथड़ों से पटी सड़कें
पर्व के बाद एक उजाड़ और खालीपन
पुराने दिए के तराजू में
तौली हुई कौड़ियों में तुला बालपन
ओस की झालर से चिकने बिजली के तार पर
फिसलकर आई भोरहरी किरण
दरवाजे पर लटके सूप
और ऊँख के झुरमुटों के पार झाँकते लोकगीत
इन सबसे मिलकर बनी है अक्टूबर की काया
कटनी और ओसावन के बाद के दूधिया धान की
गंध से सुवासित है अन्न की कोठरी
डोंगा भर धान की ढेर पर बाला गया दारिद्रनाशी दीप
छज्जे के दीपक के बगल में पड़ोस का अंधकार
शरद के काँस के फूल खेतों से निकलकर
दूर शहर में उड़ते हैं जादूगर की दाढ़ी के बाल बनकर ,
इसकी आखिरी सुबहें
डूबती-उतराती हैं शहर के कुहासा लिपटे धुएँ में ।
अक्टूबर में शामिल हैं सभी ऋतुएँ
सितंबर की उष्णता और नवंबर के शीत से
मिलकर बना है अक्टूबर का कलेजा ;
अक्टूबर के पास
अपने दुःख काटने के लिए
केवल काँस के पंख हैं
और इंतज़ार कहने के लिए
झरे हुए हरसिंगार के फूल ।
विदा
पानी में भर चुकी है फड़फड़ाहट
साँसें तैर-तैर कर ऊपर आ रहीं
तन गई हैं नसें लहरों की
एक ओर से दूसरी ओर तक सिहर चुकी है नदी
किसी मछुआरे ने अभी-अभी
जाल खींचा है नदी से।
केतन यादव (जन्म : 18 जून 2002) ने हिंदी में एम.ए. किया है और वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोधरत हैं। उनकी कविताएँ समालोचन, तद्भव, वागर्थ, पक्षधर, कृतिबहुमत, साखी, समकालीन जनमत तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं व वेब माध्यमों पर प्रकाशित हुई हैं।
संपर्क : yadavketan61@gmail.com