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आकाश वापस लौट जाता है - जनमेजय की कविताएँ
क्षितिज पर एक खिड़की
बंद होने लगती है
वृक्ष की फुनगियों पर टिका
आकाश वापस लौट जाता है
लेकिन कोई दावा नहीं करता।
Jun 27


प्रभात की कविताओं से सजा संसार
प्रभात की कविताओं का आम आदमी इस देश का मध्यमवर्गीय और ग़रीब आदमी है। उसे भरे बाज़ार में घिसी चप्पलों का तकिया लगाकर नींद आ जाती है।
Feb 13


किसी भी नंबर से आ सकता है मुझे तुम्हारा फोन — केतन यादव की कविताएँ
तभी मेरे भ्रम ने मुझसे कहा
अब दुनिया के सभी नंबर तुम्हारे ही हैं
किसी भी नंबर से आ सकता है मुझे तुम्हारा फोन।
Sep 8, 2025


वन्ध्या प्रार्थनाओं और लौटती स्मृतियों के बीच – दीप्ति कुशवाह की कविताएँ
मैं लौटती हूँ
न घर, न देहरी, न दीवार
बस एक पुरानी बाँस की खटिया
जहाँ समय ने रस्सियों को झुकाकर
लौटने और न लौट पाने का अंतर लिखा है।
Sep 4, 2025


मेरे संसार के दायरों तक जल आ पहुँचा है : अजय नेगी की कविताएँ
मेरे संसार के दायरों तक जल आ पहुँचा है
सबकुछ अब धुँधला जाने की कगार पर है
इन्हीं क्षणों में मुझे भी कुछ करना है
मैं मनुष्य हूँ सो आँखें बंद कर रहा हूँ।
Aug 12, 2025


जीवन एक अभ्यास था — अभिनव श्रीवास्तव की कविताएँ
इच्छा मैं चाहता हूँ आज सबसे पहले भंग हो मेरा संभ्रान्त होना मुझे छू जाए कोई मैली-कुचैली देह कोई मुझे भी दे जाए धक्का और मैं भी पीड़ा में...
Aug 10, 2025


सिवाय कविता के कही कोई तफ़तीश न थी - कमल जीत चौधरी की कविताएँ
अधिकतर सार ईश्वर अधिकतर; ईश्वर नहीं रहने दिया गया भक्त अधिकतर; भक्त नहीं रहने दिए गए नागरिक अधिकतर; नागरिक नहीं है सरकार अधिकतर; सरकार...
Aug 3, 2025


आडंबर में प्रतिस्पर्धाएँ — अंजली विशोक की कविताएँ
कहीं प्रेम में तीसरी रोटी के तोड़ने को
कहीं वह मैली बुशर्ट का कॉलर चमचमाने को
और कहीं,
वो हर रोज़ भूलती उस तख़त पर पड़ी घड़ी,
ताव दिखाता वह बटुआ
बड़ा अक्खड़ था,
जो मेरी नर्म उंगलियों के बीच पत्थरों में अपना ख़ूबसूरत चित्र ढूँढता रहा
Jul 17, 2025


क्या यह वही आषाढ़ है — विजय राही की कविताएँ
नीम की छाया में बैठा सोच रहा हूँ
मुझे आश्चर्य हो रहा है
क्या यह वही आषाढ़ है
जो पहले हुआ करता था
क्या मैं अब भी वही हूँ
जो पहले हुआ करता था
Jul 16, 2025
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