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वन्ध्या प्रार्थनाओं और लौटती स्मृतियों के बीच – दीप्ति कुशवाह की कविताएँ

  • poemsindia
  • Sep 4, 2025
  • 4 min read
दीप्ति कुशवाह की कविताएँ


लौटना


मैं जब लौटती हूँ


तो अपने भीतर लौटती हूँ


वहीं जहाँ स्यारपाठ की ऊँचाई पर

सागौन की छाया निस्तब्धता में काँपती थी 


और तुम्हारे कंधों पर गिरती थी हल्की नींद


जैसे कोई भूला हुआ स्पर्श


जिसका नाम अब केवल रंध्रों में है


और स्मृति में बस उस संध्या की तरह


जिसमें तुम्हारी आवाज़ नहीं थी


यह गाँव, गाँव नहीं रहा अब


पर इसकी गलियों में


अब भी बैठते हैं कुछ नाखुश लोग


जो कान पर धागा चढ़ा कर लिखते हैं

स्त्रियों के लिए नियम


छींका लटकाते हैं ऊपर की बल्ली से


जहाँ बासी रोटियाँ निस्पन्द सड़ती हैं

और कुछ बच्चों की भूख

मृत्यु प्रमाणपत्रों पर हस्ताक्षर करती है


मैं इन्हीं गलियों से गुजरती हूँ


ताकि पा सकूँ महोक की वजनदार बोली


जो पहली बार हमने साथ सुनी थी



कभी यहाँ एक बावड़ी हुआ करती थी

अब मेरी ही आँखें वापस आती हैं जल बन कर



मैं लौटती हूँ 


न घर, न देहरी, न दीवार 


बस एक पुरानी बाँस की खटिया


जहाँ समय ने रस्सियों को झुकाकर


लौटने और न लौट पाने का अंतर लिखा है।



प्रतिध्वनियाँ


कभी-कभी लगता है


धरती को पढ़ा जाना चाहिए

मिट्टी में बसे नमक की परतों में


जहाँ हर दरार में छुपा है बीते समय का पसीना


जहाँ गिरी पत्तियों के अंधकार में

बीज अपना प्रारब्ध पानी पर लिखते हैं


जयस्तम्भ के साये से गुजरती गायों की पीठ पर

गहरी घाटियाँ हैं


मानो पुरखों के धँसे पदचिह्नों से बने हों नक़्शे


सूखते कुएँ के गले में

अटकी पड़ी हैं प्यास की प्रतिध्वनियाँ

और आस्था का भूगोल

भ्रमित रेखाओं में उलझ कर

अपने ही परिणाम से परे हो जाता है


रंगमंची स्तोत्रों में


गलत उच्चारण से बंधे देवता छटपटा रहे हैं

बाहर भेड़ों का रेवड़


एक ही दिशा में धकेला जा रहा है


बिना जाने कि रास्ता


चारागाह का है या वधशाला का।


प्रश्न


कितना भी माँजा जाए


जात जमी रहती है साँसों पर जुए की तरह

एक लड़का दफ्तर में अपना नाम बदलता है

पर कुर्सियों से चिपके मौसम बदलते नहीं



वह लड़की जिसे घर की इज्ज़त कहा गया

और खोल ली जिसने टेनिस सिखाने की कक्षा

मानो अपनी हँसी से मिटा दी कोई रेखा


तुम खिड़की से देख रहे हो संसद


और मैं सोच रही हूँ


क्या कोई लड़की कभी गोली खाते हुए जान पाती है 


कि संविधान की सतरों से

मिट चुके हैं उसके अधिकार


प्याज काटते हुए औरतों का खून गिरा था चौके में


अब मैं उसी जगह


आह बिछाकर सोती हूँ


तुम नहीं जानते


पर मेरी रीढ़ पर वह औंधा इतिहास रखा है


जिसे कोई मंत्री नहीं पढ़ता


बस प्रेमी कभी-कभी अनजाने में छू लेता है


तुम्हारे घुटनों पर बैठा एक देश


अक्षांश-देशांतर की नींव पर बना है

लेकिन बादल फटने से मिट सकता है

अभी इसी बीच 


मेरी देह से झरते फूलों की उजास में 


यह प्रश्न सुगबुगाता है

क्या यही समय है, सही सवाल पूछने का 


या हम फिर पिताओं की पिस्तौलों को हँसने का मौका देंगे?



शरण


दुबरी के जंगल में जब पत्तों ने

बचपन की हँसी गिराई

मैंने पुराने टायरों से बनाया झूला

उस पर बैठकर देखा


कि समय वास्तव में उल्टा बह सकता है



तुम दूर थे


और शहर की सड़कों पर बिखरे थे टूटे शीशे


जिनमें झलक रहा था लोकतंत्र


उन बेदम नारों की तरह

जो अभी-अभी गुजरी शोभायात्रा से उछल कर गिरे थे


मैंने तुम्हें पुकारा


जैसे कोई भाषा पुकारती है अपनी वर्तनी को


बच्चों को अब उसकी जरूरत नहीं

वे मोबाइल में पढ़ते हैं 'मातृ' को


तुम कहते हो तुलसीदास की चौपाइयाँ अच्छी हैं

मैं पूछती हूँ

क्यों नहीं लिखा किसी ने उस राजदुलारी को

जो सोने की चौखट पर काँपती रही

दोष की आँच और लोक की शंका के बीच?


तुम्हारा प्रेम पतली साँसर से झाँक लेता है


जो कभी दूध में घुली चीनी की तरह

गायब हो गया था


पर मीठा रह गया था तालु में

कहते हैं, जब बहस बहुत पुरानी हो जाए


तो प्रेम बन जाती है


और मैं तुमसे बहस करती हूँ


क्या कविता लिखते हुए


कोई स्त्री अपवित्र हो जाती है?


लोग कहते हैं, शब्द अंतिम शरण हैं


पर मुझे लगता है


पृथ्वी ही सबसे बड़ा शब्द है


जिसे हर सरकार आँकड़ों में बाँट देती है।



क्षरण


वे जानती थीं


कहाँ मिलता है पहाड़ी भिलमा 


और हर्रा नाले में कब उतरते हैं जंगली सूअर

वे पहचानती थीं पौधों को रंग से, गंध से


कि किसे छूना नहीं चाहिए


और किसे पीसकर


घाव भरा जा सकता है


वे जब माथे पर आँचल डालती थीं


नीम छाँव भी काँप जाती थी

पिघलते सूरज की तरह

न सही पानी


पर धार की गहराई बहुत कुछ सिखा देती है


फिर नेता आए नर्मदा आरती करवाने


बाबाओं की बातें मंच पर दोहराई जाने लगीं 


पातालकोट के गड्ढों से रिसते घावों को वे नहीं छूते थे 


उस ओर पीठ किये स्त्रियाँ


ढेंकी में धान कूटती रहीं 


वे कभी नहीं जान पाईं कि उनके नाम पर 


सरकारी सूची में किनकी थालियाँ भरती रहीं


उनके सुनसान प्रदेशों में

बहुत सारे लाल-नीले निशान हैं

चूल्हे की आग पर जलती रहीं उनकी भूलें


जैसे कोई दंड था जो आदिकाल से

हर रोटी से वसूला गया


कच्चे सूत में लिपटी सतपुड़ा की हवाएँ

सांय-सांय कर जब पहाड़ की पीठ से टकराती हैं

आधी रात बूट की दस्तक कोई

किवाड़ पर गोली सी बजती है


तन्नौर के घाट के पास

परमार मंदिरों पर क्षरण ने खुद को लिख दिया है 


इसी तरह विद्यालय की छतें गिर रही हैं इतिहास की राख में


वन्ध्या प्रार्थनाओं की जमीन तले दबी जा रही हैं

भविष्य की स्लेटें।




1 Comment


अमिताभ मिश्र
Sep 09, 2025

दीप्ति की कविताएं हमारे समय की विभीषिकाओं से दो चार करतीं प्रभावी कविताएं हैं

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