सिवाय कविता के कही कोई तफ़तीश न थी - कमल जीत चौधरी की कविताएँ
- poemsindia
- Aug 3, 2025
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अधिकतर सार
ईश्वर अधिकतर; ईश्वर नहीं रहने दिया गया
भक्त अधिकतर; भक्त नहीं रहने दिए गए
नागरिक अधिकतर; नागरिक नहीं है
सरकार अधिकतर; सरकार नहीं है
गुरु, शिष्य, प्रेमी, पिता, बेटा...
और तो और
'और' भी अधिकतर; 'और' नहीं रहा...
पूछना कुछ नहीं; बताना यह है -
जो हुआ; अधिकतर अच्छा नहीं हुआ
जो हो रहा है; अधिकतर अच्छा नहीं हो रहा
जो होगा, इस हो रहे पर; निर्भर होगा।
स्नान
जल-बीज, जल में प्रस्फुटित हुआ
मगर उसका स्नान जल के बाहर आकर हुआ।
पहला स्नान:
धरती को कुछ और निग्घा करते हुए
दादी के पैरों पर हुआ।
दूसरा स्नान:
दोपहर के दरवाज़े पर तोरण टांकते हुए
औरतों के गीतों-छाया तले हुआ।
तीसरा स्नान:
भाई-बंधुओं के पोरों को गीला करते हुए
कफ़न सिलती औरत की *उत्तर-बहनी में हुआ।
स्नान तो तीन ही थे
बाकी डुबकियां थीं, जिनने जल को मैला किया।
उत्तर बहनी- उत्तर की ओर बहने वाली नदी
मेरा कमला मन
पैरों में घुंघरू नहीं बाँधे
कलाई पर फूल माला नहीं गूँथी
सूत का फंदा देखा
और आगे बढ़कर गले में डाल लिया
मसान तक
दूसरों के कंधों पर नहीं
अपनी लाश पर पौढ़कर पहुँचा हूँ
मेरा कमला मन
कार्तिक महीने की शादियों में नहीं,
इश्क़ के आषाढ़ में नाचा...
तफ़तीश
हर जगह टैग का मामला था
हर जगह टैग था
और कहीं भी
धागे का एक सूत तक न था
और सिवाय कविता के
कही कोई तफ़तीश न थी।
तीन सवाल
मेरी आँखों में
खेतों की ओर जाती पगडण्डी देखकर
एक लड़की कहती है :
'तुम्हारे पैरों पर कविता लिखी जा सकती है'
कविताएँ किसके पैरों पर लिखी जाती हैं?
मेरी छाती पर कान धरकर
भतीजा बोलता है :
'चाचू, इस पहाड़ के अन्दर आवाज़ नहीं टूटती'
आवाज़ किसकी नहीं टूटती?
एक बुज़ुर्ग
मेरी कविता सुनकर कहता है :
'तुम बान का *मंजा बुनते हो'
बान का मंजा कौन बुनता है?
बान- मुंज
मंजा- चारपाई
कवि के बारे में:
कमल जीत चौधरी हिन्दी के सुपरिचित कवि-लेखक व अनुवादक हैं। इनकी कविताएँ, आलेख, अनुवाद और लघु कथाएँ हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और अनेक ऑनलाइन मंचों से प्रकाशित हैं। इनके दो कविता संग्रह - 'हिन्दी का नमक' ( 2016 ), 'दुनिया का अंतिम घोषणापत्र' ( 2022 ) प्रकाशित हुए हैं। इन्होंने जम्मू-कश्मीर की प्रतिनिधि कविता पर एक किताब, 'मुझे आई डी कार्ड दिलाओ' ( 2018 ) का संपादन भी किया है। इसके अलावा इनकी चुनिन्दा कविताओं का एक चयन भी प्रकाशित हुआ है।
इन दिनों 'पहलीबार' पत्रिका के लिए 'परांस' शीर्षक से एक मासिक स्तम्भ लिख रहे हैं, जिसमें जम्मू-कश्मीर की कविताई को संपादित व रेखांकित कर रहे हैं। इनकी कविताई को प्रतिष्ठित 'अनुनाद सम्मान'(2016) और 'पाखी: शब्द साधक सम्मान' (2019) से सम्मानित किया गया है। इनकी कविताओं के अनुवाद उड़िया, बंगला, मराठी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में हुए हैं। इनसे kamal.j.choudhary@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।



कमल की कविता हमेशा एक निग्घापन देती है। सादी, साफ-सुथरी, सुदृढ़, तराशी हुई कलाकृति जैसी हैं ये कविताएं। अपने इलाके को घुट्ट के पकड़े हुए। - अनूप सेठी
अति सुंदर
हिंदी में आज आकार में छोटी और आशय में बड़ी कविताओं का कोई उस्ताद कवि है, तो कमल जीत है। इस शिल्प की साधना नहीं की जा सकती, यह कवि की उद्भावना में शामिल होता है।
प्रिय पोयम इण्डिया, इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार प्रकट करता हूँ। ज़िंदाबाद रहें!
प्रिय पाठको, धन्यवाद! पढ़कर अपनी प्रतिक्रियाएँ भी दें। आपको शुभकामनाएँ!
~ कमल जीत चौधरी