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खेमकरण ‘सोमन’ की कविताएँ

  • Jul 1, 2025
  • 3 min read

खेमकरण ‘सोमन’ की कविताएँ


परजीवी


पेड़ बढ़ रहे हैं ऊपर

और पेड़ों पर लटक रही लताएँ

बढ़ रही हैं नीचे


पेड़ छूना चाह रहे हैं आसमान

लताएँ छूना चाह रही हैं धरती


पेड़ देख रहे हैं ऊपर

लताएँ देख रही हैं नीचे


पेड़ सोच रहे हैं कुछ और

लताएँ सोच रही हैं कुछ और


अब ये परजीवी लताएँ क्या जाने

जिनकी जड़ें होती हैं धरती में

वे ही छू पाते हैं आसमान,

चाहे... दूसरों के कन्धों पर

झूलते रहो जीवन भर !



आम-अमरूद


अपनी ज़मीन से दूर

छत पर गमलों में उगे आम-अमरूद

लग रहे हैं ऐसे

जैसे कुपोषित बच्चे

या इनबॉक्स और

व्हाट्सएप पर आया कोई अजनबी

या अनाथ मैसेज


आम-अमरूद देखते हैं छत से नीचे

ज़मीन कई मीटर

मिट्टी कई मीटर दूर,

गमले में उनकी जड़ें इतनी सिकुड़ गईं

कि

चाहकर भी गमले से बाहर निकलकर

छू नहीं पा रहीं अपनी मिट्टी-ज़मीन को

वे मन मसोसकर रह जाते हैं

वे रो भी नहीं पाते सही से

इतना बिखरा होता है उनका व्यक्तित्व

और दुःख


मेरे दोस्त,

तुम अपने गाँव-शहर से बाहर क्या गए

कि तुम्हारी ज़िन्दगी भी हो गई

आम-अमरूद।



उसने डायरी में लिखा


अपशब्दों की बौछार

केवल अपशब्दों से ही नहीं बल्कि

चेहरे से भी होती है

हाव-भाव से भी होती है

दुत्कार से भी होती है

इनकार से भी होती है

होती है डाँट-डपटकर भी

ठाठ-बाट की ऊँची परंपरा से भी


जब ये सब कम पड़ जाएँ

तब अपशब्दों की बौझार होती है आवाज़ से-

तू कुछ नहीं पाएगा अपने जीवन में

तू ग़रीब जात

पेड़ से झड़े हुए सूखे-पीले पात

तू पढ़ेगा अ ब स

1947 में पाकिस्तान से आया तू

थू थू थू


बेरोजगारी और ग़रीबी की छाँव में

अपने लिए ये सब सुनता हुआ एक युवा

बस अपनी जगह पर खड़ा रहा

चुपचाप करता रहा विचारों के समुद्र में

सतत मंथन


कामयाबी की सीढ़ी चढ़ने

और कई बसंत गुजरने के बाद

उसी युवा ने देखा एक दिन

एक सूख चुके पेड़ को

जिसे देखने-समझने वाला कोई नहीं था

कोई नहीं था उसके करीब

हवा पानी बादल धूप चाँद तारे

सब उसके अगल-बगल होकर भी

उसके साथ नहीं थे

तब उस युवा को उस आदमी की याद आई

जिसने उसे गालियाँ दी थीं

दिए थे अपशब्द

दिए थे पेड़ से झड़े पीले पात की संज्ञा


युवा ने शहर में जाकर उस आदमी को देखा

तो देखा वह बिलकुल

सूख चुके पेड़ जैसा हो चुका था


उसने डायरी में लिखा-

कभी-कभी आदमी के अपशब्द ही

ले डूबते है आदमी को।



कुछ दिनों बाद


इधर लकड़ियाँ विदा हुईं जंगल से

उधर लड़कियाँ भी विदा हुईं

ढोल-बाजे के साथ

अपने घरों से


न लकड़ियाँ जानती थीं

ना ही लड़कियाँ

कि दोनों ही जला दी जाएँगी

कुछ दिनों बाद।


दो दिनों का अवकाश


दो दिनों का अवकाश माँगा था

केवल दो दिनों का

पर-

इक्कीसवीं सदी के मंच पर

दो दिनों का अवकाश भी

नसीब न हुआ उसे अपने विभाग से


उस दिन दुःख झड़ता रहा

न जाने कहाँ-कहाँ का कुआँ भरता रहा

आँखें मंद-मंद सूखती रही

आत्मा हर जगह से चूकती रही

विलासिता की हर चीज लगने लगी अधूरी

ऐसी ज़िन्दगी भी ख़ाक पूरी!


बहरहाल,

उधर शमशान घाट में माँ जल रही थी

और इधर अपनी ड्यूटी पर वह।



इतिहास रहेगा सदियों तक


पेड़ रहेंगे सदियों तक

पहाड़ रहेंगे सदियों तक

नदियाँ

सूरज

चाँद

तारे भी रहेंगे सदियों तक


याद रहेगी

आवाज रहेगी

गूँज भी रहेगी

ये सब रहेंगे समुद्र, बादल, बारिश

और आकाश की तरह सदियों तक


जिसे छुआ न जा सके

जिसे देखा न जा सके

जिसे सुना न जा सके

उसके होने

या न होने का क्या अर्थ


मनुष्य रहेंगे सदियों तक

उनकी कहानियाँ रहेंगी सदियों तक

पर नहीं रहेंगे मनुष्य, मनुष्य की तरह

इतना गिर चुका है अब

मनुष्यों का स्तर


इतिहास रहेगा सदियों तक

शांति रहेगी सदियों तक

पर नहीं रहेगा युद्ध सदियों तक


विचार रहेगा सदियों तक

विचारों के स्रोत रहेंगे सदियों तक

जिनसे डरते रहेंगे हमेशा ताकतवर


शिक्षा रहेगी सदियों तक

लेकिन सदियों तक नहीं रहेंगे

अपने में सिमटे कमजोर-डरपोक शिक्षक-

प्रोफेसर, कवि-लेखक

सदियों तक नहीं रहेगा इनका बड़बोलापन

जो खत्म कर रहा है इन्हें

इन्हीं के जाल में फँसाकर-

दिन-रात।


कवि के बारे में:


खेमकरण ‘सोमन’, युवा कवि-कथाकार।


शिक्षाः एम.ए. [हिंदी-समाजशास्त्र], बी.एड., यूसेट, यूजीसी नेट-जेआरएफ, पीएच. डी.

परिकथा, पाखी, कथाक्रम, इंडिया टुडे वार्षिकी-2024, गुलमोहर, कथादेश, वागर्थ, कादम्बिनी, शैक्षिक दखल, पुरवाई, और बया सहित देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कविता संग्रह ‘नई दिल्ली दो सौ बत्तीस किलोमीटर‘ और ‘दस्तक-2‘। लघुकथा संकलन‘ पड़ाव और पड़ताल-15 और ‘लघुकथा सप्तक‘ में लघुकथाएँ संगृहीत। ‘क्या फर्ज़ है कि सबको मिले एक सा जवाब’ में साक्षात्कार संकलित।


सम्मान/पुरस्कार:

1. कहानी ‘लड़की पसंद है’ पर दैनिक जागरण द्वारा युवा प्रोत्साहन पुरस्कार।

2. कथादेश अखिल भारतीय हिंदी लघुकथा प्रतियोगिता में लघुकथा ‘अन्तिम चारा’ को तृतीय पुरस्कार।


सम्प्रति : असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग। khemkaransoman07@gmail.com


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