आकाश वापस लौट जाता है - जनमेजय की कविताएँ
- Jun 27
- 2 min read

अर्थ
यह जगह: पृथ्वी और आकाश का
अंतिम बिन्दु है।
यहाँ: गोधूलि बेला का
नि:शब्द सुनसान है।
यहीं: केलि करते हैं
दिन और रात के दर्शन
और भोर होने से पहले
यहीं से अपनी-अपनी राह
चले जाते हैं क्रमश:
अँधेरे और उजाले की खोज में
लेकिन पीछे रह जाती है
थकी-माँदी घड़ी की टिक-टिक में
एक सुबह देवताओं और मनुष्यों के
नियमों से अस्त-व्यस्त
जहाँ हर रोज उसे
पृथक करना होता है
जल को जल के अर्थ से।
खुलते वर्णन
और अब तक
कितनी बार काँप चुकी है
अनन्त जैसी सीढ़ियों पर
कदमों की धमक से
मेरे इस सीमित जीवन में
प्रशांत दीप की अतृप्त ज्योति।
और अँधेरे का वह भूखा फूल
संभावना के दिनों की तरह
कंपकंपाते मेरे हाथों में
कितना सत् था
संभावनाओं से रहित
किसी भी डर के विपरीत।
और एक के बाद एक खुलते वर्णन
उस चीख के जिसमें मैं
निरंतर गतिमान हूँ कि
किसी तरह माप सकूँ
समय के आकार के भूमि के
उस टुकड़े को
जहाँ शिल्पी मुक्त होता है।
निर्दोष दृश्य
वृक्ष के एक कोने पर
झूल रहा है एक पूरा शहर
जहाँ थके हुए विस्तार
सिमटने लगते हैं छोटी-छोटी कहानियों में
इन कहानियों के विस्तार में व्याप्त
अन्यों से पृथक एक आकस्मिक दिन
जहाँ से चिन्हों का पीछा करते गंतव्य
कई प्रश्नों और कई धूलों के साथ गुजरते हैं
आखिर अपनी स्मृतियों के निर्दोष दृश्यों में
कोई कितनी मुड़ी-तुड़ी सड़कें
रख कर चल सकता है।
पृथ्वी अपने आकाशीय पंख
ब्रह्मांडीय अँधेरे पर पटकती चली जाती है
गुरुत्वाकर्षण का कसैला स्वाद
दूर तारों तक छितरने लगता है
शहर अपनी लपटें बुझा देता है
धूप, पृथ्वी की त्वचा को स्पर्श करती
धीरे-धीरे खड़ी होने लगती है और
दूर मील के पत्थर पर सूर्य
पथिकों की चर्चा में सम्मलित हो जाता है।
दावा
बुझते दीपक की लौ की तरह
काँप रही हैं खुली धूप में डूबते
एक आदमी की उँगलियाँ
इनकी छाया की रूप-रेखा
और शब्दों के हेर-फेर से
गहराई तक कटी पृथ्वी भी
हल्की-हल्की काँप रही है।
हिचकिचाहटें अपने पंख समेट कर
कुछ उथली चीज़ों की प्रतीक्षा में
हमारी छतों पर उतरने लगती हैं
मैं घबरा कर अपने हाथ
अपनी जेबों में ठूँस लेता हूँ
कितने ही लोग अनजाने में ही
अपनी-अपनी उँगलियों को छूकर
गहरी साँस लेते हैं
क्षितिज पर एक खिड़की
बंद होने लगती है
वृक्ष की फुनगियों पर टिका
आकाश वापस लौट जाता है
लेकिन कोई दावा नहीं करता।
सच और झूठ
मुख्य दृश्य के पीछे
मामूली पहचान लिए
एक बेमानी चेहरा थोड़ी देर
मेरी फाँक में रह जाता है
पर्दों के लिए यह महत्व की
घटना हो सकती है लेकिन
विकल्प बार-बार आ जाते हैं
जैसे मेरे लिखे शब्द
मुझे नहीं पहचान पाते हैं।
जब मैं सोच रहा होता हूँ
सृजित अर्थों की चहारदीवारी में
जहाँ तथ्य अर्थों के विस्तार में संलिप्त हैं
शब्दों के पारदर्शी अंतर के पीछे
मेरे हाथ फिसलते हुए दिखायी देते हैं
अभिनय अब सपाट होना शुरू होता है
तमाम आडंबर धीरे-धीरे रीतते जा रहे हैं
कुछ देर और फिर इसके चरम पर
मैं वैसा ही सच रह जाऊँगा जैसा झूठ।
जनमेजय युवा कवि है। उनकी कविताएँ इस से पूर्व गोल चक्कर, जानकी पुल एवं सेतु में प्रकाशित हुई हैं।



Comments